Tuesday 26 August 2008

प्यासी ईद

इन निगाहों की तिशनगी बुझ गई दीदार से,
प्यास जो बढ़ गई होठों की तो क्या कीजे,
करीब आते नहीं तुम ज़माने के खौफ से,
हसरत छूने की कर गई तो क्या कीजे

दूर से तेरे ज़माले रूह की दीद हुई,
हिजाब तेरा लेकिन मुझे दीवाने बना गया,
चैन मिला रूह को तुझसे रूबरू हो,
जिस्म जो और बेकरार हुआ तो क्या कीजे,

बुझती हुई शमा-ए-जिंदगी फिर चिरागां हुई,
तुने छुआ और छूकर धड़कने तेज कर दी,
काबू किया जज्बा-ए- वसल बामुश्किल,
दिल जो मचल गया तो क्या कीजे,

हसरतें तमाम मचलने लगी बेधड़क ,
हर वक़्त तेरे साथ की उम्मीद में
तुम्हे मुबारक तुम्हारी हातिमी सारी,
मैं जो दीवाना हुआ तो क्या कीजे.

No comments:

Post a Comment