Thursday 28 August 2008

Global warming

इस बरस भी बारीश होगी
इस साल भी बादल छायेंगे
बूंदे तो उनके साथ होंगी लेकिन
धरती के मौसम बदल जायेंगे

ये कुदरत भी रो पड़ेगी और
सारी इंसानियत आंसू बहायेगी
जब सहरा तो सहरा रहेगा मगर
जंगल भी सहरा बन जायेंगे

इस हयात की ना पूछ ए दोस्त मेरे
यहाँ ऑर हर कोहराम होगा
जब दरख्तों पे परिंदे न होंगे
और सारे पहाड़ पिघल जायेंगे

हर तरफ दिन रात सिर्फ एक आग होगी,
ओर होगी तिशनगी की एक इन्तहा
हर रोज़ जब के काफिले निकलेगा
ओर पानी को ढूँढने जायेंगे

न दरिया कोई रहेगा बाकी
न सबको रोटी मिलेगी
खारे पानी के सैलाब में से
एक चुल्लू भर पानी भी न पी पायेंगे

बस, रोक लो बर्बादी के कारवां को
कुछ तो रहम मांगती है ज़मीन भी
उस वक़्त की सोचो जब हमारे बच्चे
इस ज़मीन पर रह भी ना पायेंगे

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