Wednesday, 27 August, 2008

वो बोसा

मेरी नाज़ुक गर्दन पे,,
तेरा वो बोसा आतिश भरा,
उफ़, ऐसी अजब हरारत,
दम अब निकला की अब निकला,
मुलायम पैकर, तराशा हुआ,
मरमरी और रेशमी,
तेरी आँखों की गर्मी से,
अब पिघला की अब अब पिघला,
होंठ मखमली कांपते हुए ,
सुर्खी आफताब की,
तेरा दिल मचल के,
न तब संभला न अब संभला,
नर्म गेशुओं की छावं,
झुका के तेरे चेहरे पे,
मेरा आंचल अनजाने में,
जो ढला के यूँ ढला...

2 comments:

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