Wednesday, 27 August, 2008

ख़याल...

हम पीते नही पिलाते हैं
नशे में लोगों को बहकाते हैं
आप धोखा न खा लेना ए दोस्त
हम तो पानी को छूकर मय बनाते हैं

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अब भी मेरी निगाहें तुझपे झुकीं हैं
अब भी मेरी साँसे तुम पे रुकी हैं
तुम पूछते हो किसकी राह ताकूँ अब
तेरी राहों में यहाँ मेरी बिछी हैं ...
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सफर सबको तनहा करना पड़ता है,
मंजिल मगर एक निकलती है,
काफिलों का हुजूम जब निकलता है,
धुल की आंधी चलती है
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किसी का इंतज़ार करते करते पथरा जाती है नज़र,
वो आते हैं और नज़र के बचा लौट जाते हैं
अब क्या शिकवा करें किसी से जब के हम जानते हैं
के वो आजकल गैरों के साथ वक़्त बिताते हैं ...
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तिशनगी और बदती है
उनके पास आने से
और वो दूर जाएं तो
मुई ये जान निकलती है
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अपनी जिंदगी से मिले एक अरसा गुज़र चुका
यूँ मर मर के जीना कोई जिंदगी तो नहीं?
ख़्वाबों में देखा कभी तो देखते ही रह गए
क्या हसीन थी कभी, जो अब मेरी रही नहीं...
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उन्हें हमारे खवाब तक नहीं आते,
और हम उनके ख्वाबों में ज़िन्दगी गुजार जायंगे,
ये खुदा कभी ये न सोचा था की,
हम मानिन्दे, दीवाना उन्हें चाहेंगे....
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तेरी राह, तेरी मंजिल, तेरी रहगुज़र,
नही मुझसे कोई वाबस्ता नही'
न जाने क्यों तेरे घर से होकर गुज़रती हूँ मैं
जबकि उस तरफ से मेरा कोई रास्ता नहीं...
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एक ज़र्रा काफी है ज़माने भर के लिए
अफताब जब आया लेकर सवेरा
इतनी धूप बिखरी है आसमा में
एक कतरा आपका एक मेरा.....
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दिल का एक कोना अब खाली हो रहा है ,
अकेली शामो का सिलसिला जारी हो रहा है ,
उसकी कीमत अंदाज़-बयां करना मुश्किल है ,
जिसका जाना मेरी जान पर भरी हो रहा है .....
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कभी वक़्त मजबूर करता है
कभी हालात साथ नही दे पाते
कभी तुम मसरूफ हो जाते हो
कभी हम सामने नहीं आ पाते....
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कोई मुझसे पूछे तेरा सपना क्या है ,
मेरा जवाब है वो सपना है, जो अपना नहीं...

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दिल को क्या हासिल होगा, दिल बेचैन-ओ-परेशान है
उसका खुदा हाफिज़ जिसपे तू मेहरबान है .....

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जिसका इंतज़ार करते हैं नयन मेरे
वो बिछड़ा है उम्र भर के लिए....

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जिंदगी से गुफ्तगू करे ज़माना हुआ
वीरानियां अब जाती ही नहीं
जो तेरी मोहब्बत की आतिश में जल गयी
उसे बारीश भी अब बुझाती नहीं...

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जिंदगी कोई ज़हर नहीं आब-ए-हयात है
चल, एक जाम मिल के पियेंगे कभी
यारों ये यार हैं हम भी, ए दोस्त मेरे
मरने से पहले दो पल साथ जियेंगे कभी....
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जिसको छोड़ गए थे अपनी राहों में
उसको आज भी तिशनगी है तेरी बाहों की ...

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अब भी एक मसला हल न हुआ,
उसके सवाल मुझको सताते हैं,
वो छोड़ गया हमे गैरों के लिए,
उसपे हौसला देखो पूछते हैं किसके लिए...

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कोई गर पूछे के वो कौन है
जिसके दर पे ज़बीं को झुका रखा है
हम कहेंगे ये सर खुदा के दर पे झुका है
और हमने अपने आशिक का नाम खुदा रखा है...
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वो दर्द देते हैं, और थकते भी नहीं
हम दर्द सहते हैं और उफ़ भी नहीं करते
उसपे सजदे में तेरे सर झुका रखा है
हमने अपने कातिल का नाम खुदा रखा है...
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तुम कहते हो गाँठें खुलने में वक़्त लगता है
रिश्तें अगर दिल से हो तो गाँठ लगती नहीं
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किसी की दुआओं का हुआ जो असर
हमारी उम्र इतनी दराज़ हो गयी
सोचते थे मर जायेंगे उनके बिना
मगर मौत आते आते नाराज़ हो गयी....
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अपनी तन्हाईयों में हमको बसा लो
हमारे ख्याल दिल में छुपा लो
वक़्त की महार्बानियाँ कभी तो होंगी
तब तलक हमारी यादों को साथी बना लो...
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मेरी तन्हाई से तेरी यादों की यारी है,
इक छाई नहीं की दूजी खुद आ जाती है...
न, इसे शिकायत न समझ, यार मेरे, के याद तेरी
कोई पीर नहीं, इसमें मेरे दर्द की दवा समाती है....

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