Tuesday, 26 August, 2008

मैं माज़ी का सोचूँ

मैं माज़ी का सोचूँ, या सोचूँ आज का मौज़ू
हर एहद में गुलों से बस कुछ ख्वार ही नसीब हुए
मेरी बुरी आदतें मेरी जिंदगी का सिला हैं
कभी जिंदगी गम के, कभी गम जिंदगी के करीब हुए

1 comment:

  1. कभी जिंदगी गम के, कब गम जिंदगी के करीब हुए....
    bahut khub...
    apne word veryfication nahin hataya...
    dekhiye pahle sign in hone ke bad SETTINGS pe jaiye, fir COMMENT pe clik kijiye, fir
    Show word verification for comments? Yes No karke dikhega use no kar dijiye..
    keep it up

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