Tuesday 26 August 2008

एक मुसलिफ की दास्तान

एक मुसलिफ की दास्तान
सह गए दर्द ज़माने भर के
भूख का दर्द सहा नहीं जाता
बिलखते बच्चों का खाली पेट
देखकर अब रहा नहीं जाता
लिहाफ की गर्मी से क्या तन तापे
जब मुफलिसी ही बदन ढाकें
उधड़ रहा है जिस्म पैबंद के बीच
गरीब बेटी से जवानी का बोझ सहा नहीं जाता
नींद टकराकर आँखों से अक्सर
लौट जाती है फिर से थककर
टूटे ख्वाब बिखरे हैं जहाँ
उससे वहाँ रहा नहीं जाता
मेरे खेतों से होकर हवाएं आती हैं
चूल्हे में पकती हुई रोटियों की खुशबू लाती हैं
यहाँ राशन में मिले चावल से
कंकंर और दाना चुना नहीं जाता
दौलत कमाने को शहर आये थे
कितने रिश्ते पीछे छोड़ आये थे
हर चिठ्ठी में पुकार सुनाई देती है
के किसी से भी गम-ए-जुदाई सहा नहीं जाता
वो कुएँ का पानी वो गोबर के उपले
वो आमों के झुरमुट के तले शाम ढले
चले, लौट के गावं सोचते हैं,
वैसे भी यहाँ पेट भरा नहीं जाता
सह गए दर्द ज़माने भर के
भूख का दर्द सहा नहीं जाता....

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