Wednesday, 27 August, 2008

लम्हें

कभी आँखों पे तकिया,
कभी गलों पे शूल.
कभी आगोश में गुम
कभी लबों पे फूल
ऐसा वक़्त भी कोई भुला सकता है,
क्या कोई किसी को इतना याद आ सकता है?

कभी हथेलियाँ टकराई,
कभी साँसे कस्मसाई,
कभी आँखे शरमाई,
कभी उंगलियाँ कम्पकंपाई ,
ये समां भला कोई दोहरा सकता है..
क्या कोई किसी को इतना याद आ सकता है?

कभी जिस्म गुदगुदाये,
कभी होंठ थर्राए,
कभी नज़रें मिलाये,
कभी फिर नज़र झुक जाये,
इन लम्हों को कैसे समेटा जा सकता है,
क्या कोई किसी को इतना याद आ सकता है?

कभी कन्धों को छूना
कभी लगे पहलू सूना,
कभी नजदीकियां इतनी,
के महक उठे पसीना
सोचते हैं कैसे उन्हें फिर बुलाया जा सकता है
क्या कोई किसी को इतना याद आ सकता है?

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