Tuesday, 26 August, 2008

शहर के लोग

मेरे शहर के लोग बड़े मसरूफ रहते हैं
खुद ही खुद के नशे में चूर रहते हैं
इश्क क्या है और उसकी शिद्दत क्या
इन बातों से बहुत दूर रहते हैं

ठीक है के हर बाशिन्दे के सिर पे सलीब है
सच है के हर शक्स अजीब है
अपनी शक्सियत का रुबाब को छोड़ के
यहाँ माशूक का गुरुर सहते हैं

कोई गिला नहीं है गर वस्ल-ओ-प्यार न हुआ
कोई शिकायत नहीं गर दीदार-ए-यार न हुआ
अजीब लोग हैं अजीब रवायेतें हैं
के यहाँ सब्र से आशिक दर्द-ए-नासूर सहते हैं

No comments:

Post a Comment