Wednesday, 27 August, 2008

एक और रूप उसका

तुम साहिल उस दरिया के,
जिसमे मेरी लहरें मचलती हैं;
तुझसे टकरा के टूट जाती हैं
बहुत मुश्किल से जो बनती हैं...

तुम जाम हो उस मय के,
जिसमे मेरा कैफ बसता है,
वक़्त बे वक़्त उतरता है,
बहुत मुश्किल जो चढ़ता है...

तुम आँखे हो उस चेहरे की,
जिसमे मेरे आंसू बसते हैं,
तेरी बेरुखी के सदके वो बेताब
बरसने को तरसते हैं...

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