Tuesday 26 August 2008

किसी का ऐतबार नही इस ज़माने में

किसी का ऐतबार नही इस ज़माने में
न ही इक्दार रह गया बाकी (इकदार - मूल्य)
राजदार बनाया था हमने जिसे
वो ही बगावत को हो गया राज़ी
मैखाने से सलामत निकलते कैसा
के नाब-ए-ज़हर पिलाया था महरबान होके
शिकायत उस जाम से करें क्यूँकर
जब मय पिलाने वाला था साकी
न पूछो क्यूँ लौटा लाये बीच रस्ते से
अपने सफीने को सागर करीं
तूफ़ान से खौफ नहीं था गरचे
किश्ती डुबोने वाला था माझी
मेरे दुश्मन बन गए रहनुमा मेरे
दोस्तों ने निभाई दोस्ती कुछ ऐसी
के वक़्त ने बना दिया है मुझे
हबीबों की बदगुमानी का आदी
बहुत कुछ भूल जाने के बाद
फिर से टीस उठी पुराने ज़ख्मों में
अब आज से शिकवा क्यूँ करें हम
जब गम ढूंढ कर लाया है माजी
महफ़िल में लबबसतान होकर (लबबसता- बंद होंठ)
खुद को हमने तनहा रख छोड़ा है
कितनी कोशिशें की निगाह-ए-यार के वास्ते
मगर वो बे-मुरव्वत न हुआ राज़ी

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