Thursday 28 August 2008

मानिंदे दीवानगी

अब बेचैनियाँ भी बेचैन हो गयी हैं
तेरे रास्तों को तकते तकते......
मेरी रहगुज़र की धूल भी
तेरे सजदे को बेकरार है
तू सबब है मेरी बे=तस्किनियों का
तू वजह मेरी उनींदी रातों का
नहीं जानता कोई और यह
मेरे दिल को तेरा इंतज़ार है
शब् भर जो ख़्याल जगाता है
एक पलक सुलाके जगाता है
उस बे-परवाह को गर्चे पता नहीं
जिस से मुझे मानिंदे दीवानगी प्यार है.....

1 comment: