Wednesday 27 August 2008

हर रोज़ शाम ढले

मेरे दर- ओ - दीवार मुझे बुलाते हैं हर रोज़ शाम ढले
मेरे रास्ते मुझे मेरे घर छोड़ आते हैं हर रोज़ शाम ढले
मेरा माजी मुझे ढूँढता है मेरे आज में अक्सर
मेरा कल और आज मेरा साथ निभाते हैं हर रोज़ शाम ढले
एक नाखुदा बनाया था मैंने भी एक रोज़
सफीना अपना उसके हवाले कर दिया था
कभी डूबाया कभी तैराया मेरी छोटी सी किश्ती को
मेरे मोहसिन मुझे यु ही डरातें हैं हर रोज़ शाम ढले
हर वक़्त एक साया फिरता है मेरे ज़हन में
न घर बनाता है न घर छोड़ के जाता है
कभी हमदम कभी हम कदम कभी अनजान बन कर
मेरे खुदाया, वो मुझे क्यों सताते हैं हर रोज़ शाम ढले

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