Tuesday, 26 August, 2008

तुम ही तुम

क्या इंतिहा है मेरे प्यार की,
ये मुझको खबर नहीं,
इस ज़मीं से उस फलक तक,
बस तुम ही तुम हो,
झील में खिलते हैं कमल,
गुलज़ार में महके कलियाँ,
मेरी ज़िन्दगी के गुल का शबाब
बस तुम ही तुम हो,
ख़ुशी और रंज सबके नसीब में,
खुदा के फज़ल से हैं,
मेरी तकदीर के सबसे रुख रंगीन
बस तुम ही तुम हो.

No comments:

Post a Comment