Wednesday, 27 August, 2008

जीतना ही मकसद है ....

कौन चाहता है हौसला रखना
हारना किसको भाता है
जीतना इंसान की हसरत होती है
जीत के ही जीया जाता है

झूठे हैं वो जो कहते हैं सब्र रखो
सब्र इंसान की फितरत ही नहीं
ख्वाइश अगर जीने की हो
तो मरना कौन चाहता है …

सिर्फ लफ्ज़ हैं ये कोरे के
हार पे दिल छोटा नहीं करते
हकीक़त में इस जहाँ में
हर शख्स सिर्फ जीतना चाहता है …

कौन खुश होता है तरक्की से गैर की
कौन है जो पराई ख़ुशी में सुकून पाता है
इस ज़माने में उससे पूछते हैं सब
जो हमेशा सिर्फ अव्वल आता है ….

जिंदगी की मशश्क़त में
सबको जीत की तलाश होती है
डूबते को तिनके भी नहीं मिलता
उगते सूरज को सलाम किया जाता है …

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