Tuesday, 26 August, 2008

किस्मत का करम

रात को रोते थे अँधेरे से डर,
लो फिर खिली धूप सवेरा हो गया,
जो हसरतें नाकाम हो गई थी,
उन्ही का ज़िन्दगी में डेरा हो गया
खिलखिलाती हंसी, मुस्कुराती आँखें,
फिर लौटी मेरी रह गुजर से,
आफ़ताब ने हाथ पकड़ जहाँ बिठाया,
वहीं सवेरा हो गया
इन हंसी ख्वाबों की ताबीर न थी,
वो मिल सके ऐसी तकदीर न थी,
कल तक कोई पराया सा था
आज वो शक्श मेरा हो गया

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