Thursday 28 August 2008

तू एक जाम है....

कुछ करने की तमन्ना है अब तक बाकी
वरना इस जीने में क्या रखा है
किसी की तस्वीर छाई है ज़हन पे इस कदर
के दर्द के सिवा सीने में क्या रखा है...

क्यूँ कुफ्र का भार उठाये फिरते हैं
बुतपरस्ती का इल्जाम भी अक्सर लगता है
तेरे नाम पे सजदा करके जी रहे हैं यहाँ
वरना इस जीने में क्या रखा है ....

एक ओर पैमाना भर दिया साकी ने
हर जाम तेरा नाम लेकर पिलाता है
इस मयखाने में सब तेरे बीमार हैं
वरना यहाँ पीने में क्या रखा है ...

डूब जाना मेरी तकदीर को हासिल न था
साहिल ने भी मगर मुझे ठुकरा दिया
नाखुदा तू है तो लहेरें पार ले जायेंगी
वरना इस सफिने में क्या रखा है...

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