Tuesday, 26 August, 2008

बेवफा

सीना चाक हुआ रूह तार तार हुई
गरचे तुम्हारे दीदार के चाह फिर बेदार हुई
आइना-ए-दिल टूटा सौ टुकडों में
हर टुकड़े में उसकी सूरत उजागार हुई
रफ्ता रफ्ता तुमको भूलने के बाद
किसी अंजुमन में फिर निगाह-ए-चार हुई
महफ़िल से उठे दिल ढलने के बाद
शाम-ए-तन्हाई किस कदर शाम-ए-बेजार हुई
देखा तुम्हें गैर के पहलू में मुस्कुराते
गए रात नींदें मेरी बेकरार हुई
पलकें भरी नींद से आँखों पे गिरी
कोरों में समाई मगर सूरत-ए-यार हुई
क्या कहें अपने अरमानों के जनाजे का
हर सांस जाती तेरी आहात की तलबगार हुई
पूछते हैं क्यों दिल-ए-नाशाद का आलम
आपकी बेवफाई मेरी मौत की जिम्मेदार हुई...

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