Tuesday 26 August 2008

तेरी सदा का इंतज़ार

कल तक जो राह तकते थे हमारी,
आज हमें उनका इंतज़ार दिन भर रहा

मसरूफियत थी बहुत लेकिन फिर भी,
ये दिल हमारा बेकरार, दिन भर रहा

रात कट गई पलकों के किनारे गुजर
सपनो को उनका इंतिज़ार शब भर रहा

आलम-ए-मदहोशी से होश में आने का,
ये बहका दिल बेकरार शब भर रहा

होठों पे रुका रुका शरमाया सा,
दबा हुआ तरसता हुआ, इकरार दिन भर रहा

बुलाओ मुझे फिर से इक बार पलट के,
के तेरी सदा का इंतज़ार दिन भर रहा…

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