Thursday, 28 August, 2008

बशर को दर्द नहीं

शहर बेदर्द नहीं गरचे बशर को दर्द नहीं
यहाँ हर आदमी सिर्फ खुद के लिए जीता है
ईंट पत्थरों से तू क्यों शिकवा करे
के यहाँ इंसान ही इंसान का लहू पीता है

इस दुनिया में कुछ लोग ही भले हैं
वरना ये कब से खाली हो चुकी होती
ज़ख्म देने को सौ हाथ खडे हो जाते हैं
ज़ख्म को मगर कोई विरला ही सीता है

तेरा सीना अगर किसी अपने ने चाक किया
तू कोई रंजिश न रख ए दोस्त मेरे
दिल तोड़ने वाले भी इसी जहाँ के हैं
दिल जोड़ना वाला भी इसी दुनिया में जीता है

इसी लिए मेरा ये मशवरा है दोस्त तुझे
के ला कहीं से मीठे पानी की लहर
दर्द के इस समंदर में फ़क़त
हर स्क्हस अश्कों का खारा पानी पीता है

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