Tuesday, 26 August, 2008

अनजाना

कोई अनजान निगाहे मेरा पीछा किये जाती है,
चलते चलते मुझे वो आवाज़ दिए जाती है,
वाकिफ नहीं में उस अनजानी हस्ती से,
क्यूँ फिर वो इक दबा सा पैगाम दिया जाती है
चुपचाप मेरी रहगुजर में से यूँ गुजरना उसका,
देखकर इधर, फिर उधर देखना उसका,
कुछ कदम आगे निकलकर फिर रुकना उसका,
क्यूँ तकदीर गाम से उसके गाम मिलाती है,
कभी जल्दी उठते पीछे से क़दमों की आहट,
कभी आगे चलकर साथ चलने की हठ,
वो कोन है मैं जान ना पाई आज तक,
मगर उसकी खामोस सदा क्यूँ मुझे बुलाती है?
हर सुबह और हर शाम की सरगोशियों में,
उसका मासूम चेहरा गलियों की दहलीज़ में ,
दिखता है खुद, या दिखाई दे जाता है, और
क्यूँ आँखें उसकी अक्स मुझे मेरा दिखाती हैं?

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