Tuesday 26 August 2008

तमन्ना-ऐ-वस्ल-ऐ-यार

रूह से रूह बात करती है
फिर हम वस्ल की तमन्ना क्यों करें
तेरी नज़रों से गुफ्तगू जाती रहे
लबों से लफ्जों की कामना क्यों करें
हरेक गोश में बैठे हैं तेरे ख्वाब यहाँ
तेरे न होने का शिकवा क्यों करें
वो हर शय तो मिल नही सकती
उस हर शय का तकाजा क्यों करें
जब ख्यालों में जी लेते हैं बेशक
उस पे तेरे न आने का गिला क्यों करें
बहुत मेहरबानियाँ हैं यूँ भी हम पे
और इस से अब तमन्ना क्यों करें....

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