Tuesday, 26 August, 2008

वस्ल-ऐ-यार

आइनों में झांकते थे तेरी सूरत देखने को
बस खुद का चेहरा नज़र आता था
आज फिर मेरी आँखों को तेरा अक्स नज़र आया
आज फिर उस आसमा का चाँद लजा के शरमाया
आज फिर मुद्दत की बाद तेरी आवाज़ सुनी
आज फिर बहुत वक़्त के बाद तेरा आगाज़ हुआ
आज दोबारा आफताब के ज़र्रे बिखरने लगे
आज फिर तेरी दीद ने मुझे ईद का अहसास कराया
प्यार के नगमे फिर गूजने लगे फिजा में
सारी कायनात गुनगुनाती सुनाई दी
आज फिर ये दिल वस्ल-ए-राग गाने लगा
आज फिर कोई अपना मेरी जिंदगी में लौट आया ..

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