Tuesday 26 August 2008

तन्हाई के लम्हे

दिल की उदासियों का जिक्र करूं
या, रात की तन्हाई का,
वो जगह कहाँ से लाऊं
जहाँ तू न बसता हो...

लम्हा लम्हा बिताने का तरीका सीखूँ,
या नींद में तुम्हे भुलाने का,
वो वक़्त कहाँ से लाऊँ
जिससे तू वाबस्ता न हो...

गली कूचों से जाना छोडूं
या सुनसान रहगुजर से,
वो रास्ते कहाँ से ढूंदु
जहाँ से तू गुजरता न हो..

जीने का सलीका सीखूँ,
या देखूं सामान मरने का,
वी शय काश मिल जाए कहीं,
जिसके लिए तू भी कम न तरसता हो...

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