Tuesday 26 August 2008

मेरे अरमान

कई हजार राहों के दरम्यां,
सिर्फ इक राह तेरी मंजिल तक थी,
ढूंढते रहे उसे मनिंदे-दीवाना ,
कारवां जहाँ रुक सके मेरे अरमानों का....

लिखा तेरे नाम, चाँद का कोना वो,
चमकाता था मेरे हिस्से की चांदनी जो,
तारों की छंव भरी रात सी तेरी ओढ़नी,
गरचे हर ज़लवा तुझको दिया, आज मेरे सामानों का...

प्याला जो छलके ना वो नाबे-मय भी क्या
इस से तो बेहतर तेरी आँखों के प्याले हैं,
जो भरे तो छाए सरुर, और छलक गए तो,
कतरा-कतरा आंसू चर्चा करे मेरे अफ्सानों का...

ये ज़रूरी तो नहीं की हर राह हमको नसीबे,
हमारी ज़रूरतें सिर्फ तुझ तक दरकार,
कहीं खुदाई लुटा रही थी जलवे बेसुमार,
मैंने तुझे चुना बस, ये हाल है तेरे दीवानों का....

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